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जयंती पर विशेष|जब 'दाने आए घर के भीतर...' गाते हुए नाचने लगे बाबा नागार्जुन

संस्मरण|डॉ. राजेश श्रीवास्तव


मे
री उम्र उस समय 21 वर्ष की थी। सागर विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहा था। विषय था-रेणु और नागार्जुन के आंचलिक उपन्यासों का तुलनात्मक अध्ययन। रेणुजी की पत्नी लतिका जी और रेणु के पुत्र पद्मपरागराय से मिलना हो चुका था। नागार्जुन के पुत्र प्रो शोभाकांत, जो हजारीबाग में थे, से पत्राचार था। बाबा के छोटे पुत्र श्यामाकांत से तो मित्रता जैसी थी। वे बहुत समय विदिशा में डा विजयवहादुर सिंह के घर भी रहे। कई बार ऐसा मौका आया कि मैं, श्यामाकांत और मणिमोहन साथ में विदिशा की गश्त में रहे। बाबा से मिलना बाकी था। हालांकि उन्हें ख़बर हो चुकी थी कि मैं उन पर पीएचडी कर रहा हूँ। मेरे गाइड कृष्णवल्लभ तिवारी जी थे। एक दिन श्यामाकांत ने मुझे बताया कि बाबा दिल्ली आए हुए हैं। सादतपुर दिल्ली में बाबा के मंझले पुत्र श्रीकांत रहते थे, उनके पास। मन न माना। दिल्ली कम ही गया था। जीटी एक्सप्रेस उन दिनों रात 10 बजे होशंगाबाद से चलती थी। जनरल डिब्बे में सफर किया। दिन में 11 बजे दिल्ली पहुँचा। डिब्बे में ही फ्रेश हो चुका था। पूछ पाछकर सीधे बस पकड़ सादतपुर पहुँचा और 12:30 बजे तो बाबा के सामने था। बाबा खटिया पर लेटे थे। मैंने बताया तो बाबा ने ऐसे दुलार किया मानो बहुत पहले से जानते हैं। सामने दूसरी खाट पर मैं बैठा। तभी वहाँ बड़े चित्रकार हरिपाल त्यागी और महेश दर्पण भी आए। महेश दर्पण मुझे जानते थे। वे सारिका के उपसंपादक थे। मेरी कहानियां सारिका में उन दिनों खूब छपती थीं। 1984 से मेरी कहानी सारिका में प्रकाशित हो रही थी।अवधनारायण मुदगल ने मुझे सम्मानित भी किया था। महेश दर्पण ने भी हौसला बढा़या। बाबा की पत्नी जिन्हें मैंने माताजी कहकर पुकारा, ने मुझे मैथी के लड्डू खिलाए। फिर खाना भी। तीन बजे तक वहाँ रहा। बहुत बातें हुईं। साक्षात्कार लिया। उन सबका मैंने अपने शोधप्रबंध में उल्लेख किया है। हालांकि बाबा अस्वस्थ थे इसलिए कई बार प्रश्नों को टाल गए, खासकर रेणु से उनके सम्बन्धों के प्रश्न। आने लगा तो बोले-विदिशा आऊं तो साथ रहना। चलते समय मैने कहा-बाबा कुछ लिख दो, बताने के लिए तो उन्होंने मेरे लिए यह (चित्र में दिखाया गया) प्रमाणपत्र लिखा, जो आज भी उनका स्मरण कराता है 

उसके बाद तो बाबा कई बार मिले। हर बार नई धमक, नई चमक, नए रंग, नए ढंग, नए अंदाज में मिले। एक बार तो कमाल ही हुआ, मेरा हाथ पकड़कर नाच उठे। साथ साथ गाते जा रहे थे-दाने आए घर के भीतर कई दिनों के बाद। फिर पंख खुजाने का अभिनय भी किया, विदिशा में। 88 में जब पीएचडी पूरी हुई तब फिर मिला। 

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