
मोहन जोदड़ो की लिपियों को पढ़ा जा सकेगा। दुनिया के सबसे प्राचीन नगर के अस्तित्व का पता 1922 से लगना शुरू हुआ था। इस घटना को अगले वर्ष सौ साल पूरे होने जा रहे हैं। भाषा वैज्ञानिकों के लिए इस नगर की चित्रलिपियां आज भी पहेली बनी हुई हैं। इस लिपि को पढ़ने के लिए दुनिया स्तर पर प्रयास जारी हैं। इस कड़ी में उम्मीद की एक किरण दिखाई है एक आदिवासी समाज की भाषा गोंडी ने। गोंडी के जानकारों ने दावा किया है कि इस भाषा की लिपि की साम्यता मोहन जोदड़ो की चित्रलिपि से है।
सिंधु घाटी की सभ्यता के प्रचीन नगर मोहन जोदड़ो का पता 1920—22 में तब चला जब भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (एएसआई) के तत्कालीन अधिकारी आरडी बनर्जी ने इस क्षेत्र का दौरा कर यहां खुदाई कराई। उनके बाद एएसआई के अधिकारियों केएन दीक्षित, जॉन मार्शल, अर्नेस्ट मैके, मॉर्टिमर व्हीलर ने इस स्थल पर शोध—अनुसंधान का कार्य आगे बढ़ाया। बेहद नियोजित ढंग से नगर बसने के ढेरों सुबूत तो वहां से मिल गए, लेकिन उस काल में उपयोग की जा रही भाषा के जो अवशेष मिले उन्हें पढ़ना—समझना मुश्किल बना रहा। सिंधु घाटी सभ्यता की चित्रलिपियों की विविध भारतीय लिपियों से साम्यता के आधार पर एक बात तो तय हो गई कि सिंधवी लिपि का संबंध द्रविड़ भाषा परिवार से है। इसके बाद इसे तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम से जोड़कर पढ़ने की कोशिशें जारी रहीं।
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डॉ. मोतीरावण (02/02/1949-30/10/2015) |
इन चित्रलिपियों को पढ़ने—समझने का सबसे ठोस दावा गोंडी भाषा के जानकार डॉ. मोतीरावण कंगाली ने किया। उन्होंने भाषा शास्त्री जॉन मार्शल, ग्रियर्सन और अन्य का हवाला देते हुए सिंधवी लिपि को गोंडी में सुलझाया। डॉ. मोतीरावण कंगाली ने जो तर्क दिए वे उनके दावों के संगत दिखे। डॉ. कंगाली ने ही पहली बार कहा था कि सिंधु घाटी की सभ्यता की भाषा द्रविड़ पूर्व भाषा थी। वह गोंडी भाषा को उसके उच्चारण और पिक्टोग्राफ़ के आधार पर सभी द्रविड़ परिवार की भाषाओं की जननी बताते थे। सिंधवी लिपि को गोंडी भाषा में समझाने के प्रयास के तहत 2002 में उन्होंने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था 'सैंधवी लिपि का गोंडी भाषा में उद्वाचन'।
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सिंधवी चित्रलिपियों की गोंडी में व्याख्या |
क्या है गोंडी भाषा?
गोंड समुदाय के लोग महाराष्ट्र, आंध्र, उड़ीसा और छतीसगढ़ सहित कई राज्यों में रहते हैं। गोंड महाराजाओं ने विदर्भ के नागपुर (1702 में बख्त बुलंद शाह ने), चंद्रपुर (भीम बल्लारशाह ने), मध्यप्रदेश के आधुनिक जबलपुर और तब गढ़-मंडला (संग्रामशाह ने) आदि अनेक शहरों को बसाया था। इस समुदाय की भाषा को गोंडी कहा जाता है। इसे बोलने वालों की संख्या लगभग 20 लाख बताई जाती है। गोंडी प्रायः देवनागरी तथा तेलुगु लिपियों में लिखी जाती है। अधिकांश गोंड लोग वर्तमान अर्थों में अशिक्षित हैं अतः किसी लिपि प्रयोग नहीं करते।
मोहन जोदड़ो की आधिकारिक साइट पर देखें सिंधवी लिपि
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