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'बंबई में का बा?' के गीतकार सागर पर निकल रहा विशेषांक

पत्रिका ​का विशेषांक निकालने के प्रचलित पैमानों से हटकर एक पहल



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बई में का बा? भोजपुरी के पहले रैप की ये लाइन आपको याद होगी। अभिनेता मनोज वाजपेयी पर शूट किए गए इस रैप का लिरिक लिखा था डॉ. सागर ने। देखते ही देखते यह धुन इतनी लोकप्रिय हुई कि इसकी तर्ज पर 'दिल्ली..यूपी..बिहार में का बा..' पॉलिटिकल पैरोडी भी तैयार हो गई थीं। बॉलिवुडिया मीडिया के कैमरे एकदम से डॉ. सागर की ओर घूम गए। कौन हैं डॉ. सागर? उन पर खबरों की लाइन सी लग गई। हालांकि लिखने—पढ़ने वालों की जमात में डॉ. सागर का नाम पूर्व—परिचित था, लेकिन इस बार चर्चा में थे बॉलीवुड की चमक वाले डॉ. सागर। बॉलिवुडिया फैंस ने पहली बार जाना था कि डॉ. सागर यूपी के बलिया जिले के ​किसी पिछड़े गांव से ताल्लुक रखते हैं। उनके बहुत से किस्से पहली बार लोगों के सामने आए थे। इस बात को अब महीनों गुजर चुके हैं। गांव, गरीबी, भोजपुरी, गीत, बीएचयू, जेएनयू और फिर बॉलीवुड। डॉ. सागर की इस यात्रा पर केंद्रित रपटें अब पुरानी हो गई हैं। बॉलीवुड मीडिया ने इन सभी तथ्यों की एक—एक करके पड़ताल कर ली है। चर्चाएं अब शांत हैं। लेकिन अब डॉ. सागर पर चर्चा छेड़ी है उस अकादमिक वल्र्ड ने जहां से होकर डॉ. सागर यहां पहुंचे। 


हमारे समाज में 'डॉ. सागर' की निर्मिति यात्रा एक ऐसी राह से गुजरती है जो हर पल हजारों असंभावनाओं से घिरी होती है। सागर जिस राह से गुजरे हैं वह नई भले न हो लेकिन अनोखी जरूरी है। और यह अनोखापन पैदा किया है उनके खुद के संघर्षों ने। जेएनयू के उस हिंदी विभाग में पढ़ते हुए भोजपुरी के प्रति अपनी 'सनक' कायम रखी, जहां कुछ प्रोफेसर हिंदी की 'अकादमिक समझ' विकसित करने के लिए अंग्रेजी को अपरिहार्य बताते रहे हैं। वहां पढ़कर डॉ. सागर अंग्रेजीदां भले हो गए हों, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने भोजपुरी  के प्रति अपने समर्पण में कोई कमी नहीं होने दी। 


डॉ. सागर को लेकर बॉलीवुड मीडिया की उस पड़ताल के बाद अब अकादमिक दुनिया ने अपनी 'जिम्मेदारी' को समझा है। आम तौर पर हिंदी की पत्र—पत्रिकाएं दिवंगत कथाकार, कवि, रचनाकार या किसी मुद्दे को केंद्र में रखती हैं। लेकिन भाषा और साहित्य पर केंद्रित हिंदी की ई—पत्रिका 'परिवर्तन' ने अपना आगामी अंक डॉ. सागर को समर्पित किया है। इस पत्रिका के डॉ. सागर पर केंद्रित अंक के लिए रचनाएं आमंत्रित करने वाला एक संदेश देखकर मुझे हैरानी हुई। हैरानी इसलिए नहीं कि यह अंक किसी जीवित रचनाकार पर केंद्रित है, बल्कि इसलिए कि विशेषांक के प्रचलित रूढ़ मानकों से बिल्कुल हटकर है। डॉ. सागर पर विशेषांक निकालने के संबंध में क्या है पत्रिका के संपादक की सोच, पढ़िए उनकी टिप्प्णी — 



रिवर्तन का अगला अंक हिंदी और भोजपुरी के लोकप्रिय गीतकार डॉ. सागर पर विशेषांक के रूप में जुलाई में प्रकाशित होगा। डॉ. सागर को बहुत लोग जानते हैं लेकिन अधिकतर लोग नहीं जानते हैं। भोजपुरी का पहला रैप सांग 'मुंबई में का बा' के बाद उन्हें पहचानने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। 


जब डॉ. सागर पर विशेषांक लाने का विचार जब मेरे मन में आया तो इस संबंध में मैंने कई लोगों चर्चा की। उनमें से अधिकतर लोगों ने कहा कि डॉ. सागर पर विशेषांक निकलना अभी जल्दीबाजी होगी। मैं कुछ पल के लिए उनकी बातों से सहमत हुआ लेकिन मेरे मानस पटल पर बार-बार मुक्तिबोध की बीड़ी पीती तस्वीर उभर कर सामने आ जा रही थी। और साथ ही यह प्रश्न भी क्या मुक्तिबोध को उनके जीते जी सही पहचान नहीं मिलना चाहिए था..! आखिर क्यों नहीं मिला, क्या वे इसके सच्चे हकदार नहीं थे..?


सही समय पर पहचान न मिलने वालों में अकेले मुक्तिबोध ही नहीं थे। धूमिल का भी नाम इसमें जोड़ा जा सकता है। इसके अलावा और भी तमाम प्रतिभाशाली लेखक-कवि-रचनाकार हैं जिन्हें वक्त ने नहीं पहचाना। यही मुख्य कारण रहा कि डॉ. सागर पर विशेषांक निकालने को लेकर मैं दृढ़-संकल्पित होता गया। इस विशेषांक के पीछे एक दूसरा कारण भी रहा। वह यह कि जिस गरीबी और बदहाली के परिवेश से डॉ. सागर निकले और बीएचयू, जेएनयू होते हुए बॉलीवुड की बुलंदियों तक पहुँचे, उससे आज के भटके हुए युवाओं को प्रेरणा लेने की जरूरत है। यह प्रेरणा कइयों को दिशा-निर्देश देगी। उनके पथ पर ले जाएगी। बहरहाल, इस विशेषांक का सम्पादन कार्य चल रहा है और कोशिश है कि इस अंक को जुलाई माह में प्रकाशित कर दिया जाये। 

- महेश सिंह, संपादक (परिवर्तन पत्रिका)

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