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भाषा का सपना साकार हो तो दूसरे सपने भी पूरे होंगे



वेब रिपोर्टर : जब आदमी दुनिया देख चुका होता है तो उसकी विचारधारा अनुभवी हो जाती है और भाषा के रूप में हमने जिन सपनों को देखा था यदि वे साकार होते तो निश्चित ही अन्य सपने भी पूरे होते। हमें अपने पिंजड़ों को तोड़ने का प्रयास करते रहना है। यह हम सबका दायित्व है कि हमारी प्रतिबद्धताएं सुस्पष्ट हों और एकलक्ष्य हों। यह बातें केंद्रीय हिंदी संस्थान, विश्व हिंदी सचिवालय के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा 'आज़ादी के 100 वर्षों के बाद भारत' विषय पर वेब—संगोष्ठी में वरिष्ठ साहित्यकार एवं केंद्रीय हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष अनिल जोशी ने कहीं। 

'पारंपरिक गौरव और ज्ञान की विरासत के साथ आगे बढ़ेगा देश'
कार्यक्रम में उपस्थित मुख्य वक्ता एआईसीटीई के अध्यक्ष प्रो. अनिल सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि यद्यपि कोरोना ने देश की विकास गति को कुछ रोका है किंतु देश का भविष्य उज्ज्वल है। देश रोटी, कपड़ा और मकान की मूल चिंताओं से ऊपर उठकर अपने पारंपरिक गौरव और ज्ञान की विरासत के साथ जोश-खरोश से आगे की यात्रा तय करेगा। 

योग गुरु डॉ. धनंजय कुमार ने कहा कि भारत एक उन्नत इतिहास संपन्न देश रहा है और हमारी दृष्टि पर्यावरण आदि विशद विषयों पर संकीर्ण नहीं रही है बल्कि हमने वैश्विक इकाई के रूप में प्राकृतिक संपदाओं के उपभोग के लिए आत्मज्ञान की शिक्षा पाई है। इटली से मार्कोजॉली ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि मैं भारत को 100वें साल में बहुत विकसित एवं उन्नत रूप में देखता हूं। विदेशों में भारत की गलत छवि प्रस्तुत की जाती है किंतु भारत अब बहुत आगे बढ़ चुका है।

डॉ. तेज पारीख ने वैश्विक क्षितिज पर भारत के संसाधनों तथा उपलब्धियों के आलोक में कहा कि हमारी ज्ञान परंपरा विवेक सम्मत उपभोग की शिक्षक एवं सामाजिक सरोकारों में नियमानुकूल वितरण की पक्षधर है। मैं हूं, इसलिए हम हैं- हमारे भारत का यही एकात्म समन्वय है और इसलिए हम संघर्ष के पक्षधर कभी नहीं रहे है। 

वरिष्ठ पत्रकार एवं भाषा चिंतक राहुल देव ने प्रधानमंत्री के शब्द अमृत काल के संदर्भ में कहा कि हमारे अमृत चिंतन से ही भारत का चरम अभ्युदय और निश्रेयस प्राप्त होगा। हम तिरोहित बंधुत्व पर भी चर्चा करें, भारत बोध संस्कारित करें और लक्ष्य ज्ञान निर्माण एवं ज्ञान निर्यात हो, जिससे विश्व हमें अपना गुरु माने न कि हमें स्वयं घोषणा करनी पड़े। उन्होंने डॉ. तेज पारीख के 'गुणाग्रही अवलोकन' शब्द की प्रशंसा में कहा कि हमें अतीत और परंपराओं को भी इस कसौटी पर परखते रहना चाहिए।

कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. राजेश कुमार ने कहा कि अमृत महोत्सव की पावन बेला में यह महत्वपूर्ण विचार गोष्ठी है। वक्ताओं एवं अतिथियों का स्वागत प्रो. अनुपम श्रीवास्तव ने किया और कहा कि विद्वान वक्ता हमें भविष्य के भारत के भविष्य की परिकल्पना के साथ करणीय उद्यमों के विषय में भी हमारा मार्गदर्शन करेंगे। कार्यक्रम का संचालन अनूप भार्गव ने किया और कहा कि पिछले 75 वर्षों का आत्मावलोकन करें एवं आगे 25 वर्षों के सुखद भविष्य पर अधिक विमर्श करें।

कार्यक्रम में सभी वक्ताओं, सहयोगी संस्थाओं, मार्गदर्शक मंडल एवं सहभागियों के प्रति पद्मेश गुप्त ने हार्दिक आभार व्यक्त किया और कहा कि हमें नई पीढ़ी को भविष्य के भारत के लिए तैयार करना चाहिए।
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