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हिंदी को अपनी आंचलिकता पर शर्म करना छोड़ना चाहिए

Facebook/dinesh.shrinet

मारी आवाज़, उच्चारण और बोलने का तरीका हमारे बारे में बहुत कुछ बताता है। हिंदी में आंचलिक उच्चारण के प्रति एक किस्म की हिकारत का भाव है। जो खड़ी बोली है उसकी कोई जमीन नहीं है। हर क्षेत्र, हर प्रदेश की हिंदी अलग है। इस लिहाज से वह हिंदी शुद्ध मानी गई है जो या तो संस्कृतनिष्ठ हो या उर्दू के तलफ़्फ़ुज़ की शर्तें पूरी करती हो लेकिन अगर वो किसी बोली की रंगत लेकर आती है तो उसे 'अशुद्ध' मान लिया जाता है।

मुझे लगता है कि यह 'भाषा का अभिजात्य' है। हम जो बात करते हैं, उसमें जहां से हम हैं, उस मिट्टी की खुश्बू क्यों नहीं होनी चाहिए? अंगरेजी स्कूलों के बच्चे एक जैसा सॉरी, थैंक्यू और शिट बोलते हैं। बिल्कुल मै'कडोनाल्ड के बरगर की तरह कि आप उसे दिल्ली में खाएं, पटना में खाएं या जयपुर में उसका स्वाद, रंग-रूप एक ही होगा। अब भला ऐसा बरगर खाने कोई दिल्ली से जयपुर क्यों जाएगा? वह तो बेड़मी पूरी खाने जाएगा जो किसी खास इलाके में होगी और उसके जैसी कहीं और नहीं होगी। भाषा को बरतने में ऐसी अपेक्षा क्या करना कि लगे सारा प्रोडक्ट किसी फैक्टरी से निकल रहा है। एक दक्षिण भारतीय या एक बंगाली जब अंगरेजी बोलता है तो शायद ही अपने अंचल का पुट आने पर शर्मिंदा होता है। उनकी अंगरेजी कानों को ज्यादा सुखद, ज्यादा कर्णप्रिय लगती है।

दक्षिण भारतीयों के उच्चारण में एक किस्म का रिदम होता है, जो उनकी अंगरेजी को भी ज्यादा सहज बनाता है। यही स्थिति यूरोप की है, पुर्तगाली और स्पेनिश लोगों की अंगरेजी तो बिल्कुल ही अलग होती है पर उससे वे शर्मिंदा नहीं होते। सारी दुनिया ने उसे मान्यता भी दे दी है। उत्तर भारत में अंगरेजी को पश्चिमी तरीके से बोलने पर बहुत जोर दिया जाता है। पाकिस्तान में भी जब लोग अंगरेजी बोलते हैं तो उनकी कोशिश होती है कि उनका उच्चारण किसी अंगरेज जैसा हो।

इस बात पर लौटते हैं कि हिंदी में आंचलिक स्वरों के प्रति ऐसी हिकारत क्यों है? शायद इसकी सबसे बड़ी वजह मुझे यह लगती है कि हिंदी भाषी लोग अपनी आंचलिकता के प्रति हीनभाव से ग्रस्त रहते हैं। एक उत्तर भारतीय दुनिया के किसी कोने में जाता है तो अपनी आंचलिक पहचान के बिना जीना चाहता है। इसकी वजह क्या है, यह तो नहीं पता पर यह मेरा और बहुत से लोगों का व्यावहारिक अनुभव है।

अगर किसी के बोलने के तरीके में भोजपुरी, राजस्थानी या अवधी का पुट है तो उसे सुसंस्कृत नहीं समझा जाता है। यहां तक कि व्याकरण की अशुद्धियों की जब बात की जाती है तो भी लोग यह भूल जाते हैं कि आंचलिक बोलियों ने अपने समाज की बनावट के मुताबिक अपनी भाषा और व्याकरण गढ़ा है। जैसे कि पूर्वांचल में 'मैं' के लिए 'हम' का इस्तेमाल, यह एक ऐसा समाज है जिसमें अब तक 'मैं' का अस्तित्व ही नहीं था। कम्युनिटी का भाव इतना गहरा था कि 'मैं' का कोई अर्थ ही नहीं होता था, हर व्यक्ति अपने में एक समूह या समाज का प्रतिनिधित्व करता था, इसलिए वह खुद के लिए 'हम' का प्रयोग करता था। शायद वहां 'मैं' का प्रयोग एक किस्म की अभद्रता या स्वार्थपरकता माना जाएगा।

भोजपुरी और अवधी बोलने के अंदाज़ में एक किस्म का संगीत पैदा होता है। ये और ऐसी बहुत सी बोलियां 'लिरिकल' बोलियां है। यह संगीत समाज की बनावट से ध्वनित होता है। यह कितना अश्लील है कि जिस जमीन से हमारी भाषा में रंग और खुश्बू पैदा हुई है उसे मिटाकर हम एक कृत्रिम भाषा को खुद पर ओढ़ लें। हास्यास्पद तरीके से अंगरेजों जैसा बोलने की कोशिश करें या एक बनावटी हिंदी जो किताबों से निकली है, उसे बोलना शुरू कर दें।

शुद्धता की अवधारणा यूनीवर्सैलिटी यानी सार्वभौमिकता से जुड़ी है। यानी कि ऐसी भाषा गढ़ी जाए जो हर जगह चल जाए। हॉलीवुड ने अपने सिनेमा के लिए एक ऐसी सिनेभाषा को जन्म दिया है कि वह दुनिया के किसी भी कोने में देखी जा सकती है, ऐसा इसलिए क्योंकि वह एक ग्लोबल मार्केट के लिए काम कर रहा है। किसी ज़माने में हिंदी फिल्मों में पुलिसवाला नफीस उर्दू बोलता था। ऐसा क्यों? क्योंकि मुंबई में बनी फिल्मों को एक साथ राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली में रिलीज़ करना होता था। एक अंचल की भाषा दूसरे अंचल के लिए अजनबी हो सकती थी।

लेकिन समय के साथ यह सब कुछ उलट गया है। इन दिनों कोई भी फिल्म तब तक नहीं सजती है जब तक कि उसके एक-दो पात्र अपने आंचलिक रंग के साथ नहीं आते। करीब 15 साल पहले बिहार का बोलबाला था, फिर हरियाणवी टोन हिट रही, इन दिनों फिल्मों में अवधी टोन खूब सुनने को मिल रही है। इतना ही नहीं बहुत सी फिल्में तो दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में बसे लोगों की बोलियों का टोन भी पकड़ ले रही हैं।

ऐसा इसलिए कि लोग बनावटी चीजों को पकड़ लेते हैं, कोई भाषा को किस तरह बरत रहा है इसमें उसका पूरा चरित्र और पृष्ठभूमि छिपा है। वास्तविक दिखने पहली शर्त है कि आपकी भाषा भी बनावट से रहित होनी चाहिए। आकाशवाणी और दूरदर्शन ने बोली जाने वाली भाषा के मानक स्थापित किए लेकिन उसे ही फॉलो किया जाए यह एक अव्यवहारिक शर्त है। सोशल मीडिया पर पुष्पा जिज्जी जैसे वीडियो इसीलिए लोकप्रिय होते हैं क्योंकि उस बोली से लोग खुद को एसोसिएट कर लेते हैं और जो नहीं कर पाते वे कम से कम उसकी विश्वसनीयता से प्रभावित होते हैं।

हिंदी के कुछ चर्चित पैरोकार भाषा की शुद्धता और अभिजात्य पर लगभग किसी लठैत की मुद्रा में होते हैं। उनकी शुद्धता की परिभाषा में शब्दकोश और मानक हिंदी के तौर-तरीके तो आते हैं मगर भाषा जिस जमीन से सहज रूप से जन्म रही है, उस पर कोई दृष्टि नहीं दिखती। मुझे लगता है कि हिंदी को सबसे पहले अपनी आंचलिकता पर शर्म करना छोड़ना चाहिए।

वे नहीं जो लिख रहे हैं, बल्कि वे लोग जो नए माध्यमों जैसे यूट्यूब या पॉडकास्ट पर आ रहे हैं, बोल रहे हैं, उन्हें शुद्धतावादी होने से बचना चाहिए। इससे संवाद ज्यादा सहज और जीवंत होगा। उनका अपना अंदाज़-ए-बयां होगा। वे बोलेंगे तो उनकी मिट्टी की महक भी बोल उठेगी। बोलियों के रंग में रंगी हिंदी भाषा और निखरेगी।
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