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हिंदी भाषा में इंजीनियरिंग की मौलिक पुस्तकों की अपेक्षा फिलहाल बेमानी



Facebook/anil.bhaskar.54

एनआईटी पटना में इस सत्र से इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिंदी में भी होगी। इस खबर ने एक बार फिर श्याम रूद्र पाठक के संघर्ष को स्मृतिकोष से निकालकर सामने खड़ा कर दिया। हिंदी के दीवाने वही पाठक जी, जिन्होंने लगभग चार दशक पहले (वर्ष 1984 में) आईआईटी दिल्ली में आखिरी सेमेस्टर की अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट हिंदी में सौंपकर तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में तहलका मचा दिया था। देशभर में नई बहस छेड़ दी थी। उनकी प्रोजेक्ट रिपोर्ट डिपार्टमेंट ने खारिज कर दी। डिग्री रोक दी गई। मगर पाठक जी ने हार नहीं मानी। हिन्दीप्रेम में अड़े रहे। मामला लोकसभा में गूंजा। इसके बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप किया। आखिर जिद की जीत हुई। मगर पाठक जी यहीं रुके नहीं। अगले ही साल आईआईटी की प्रवेश परीक्षाएं हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में कराने के लिए आंदोलन छेड़ दिया। लगभग पांच वर्ष के संघर्ष के बाद वह एक बार फिर विजेता हुए और 1990 में सरकार को हिंदी माध्यम से भी आईआईटी की परीक्षा को मंजूरी देनी पड़ी। 

यह सवाल बड़ा हैरान करने वाला है कि आईआईटी जैसे सर्वोच्च तकनीकी संस्थान में प्रवेश के लिए हिंदी में परीक्षा और हिंदी में ही कोर्स की परीक्षा को मंजूरी के बाद हिंदी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के आगाज़ में चार दशक का समय क्यों लग गया? दो दिन पहले ही दावा किया गया कि एनआईटी पटना हिंदी में इस कोर्स का विकल्प देने वाला देश का पहला इंजीनियरिंग कॉलेज होगा। इस दावे पर मुझे सन्देह के साथ आपत्ति भी है। दरअसल यह प्रयोग सबसे पहले 2016 में मध्यप्रदेश के राजीव गांधी राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में शुरू हुआ। यह बात अलग है कि यह प्रयोग अब तक कोई उत्साहजनक परिणाम लेकर नहीं आया। इस साल आईआईटी बीएचयू ने भी अगले सत्र से हिंदी में इंजीनियरिंग का पाठ्यक्रम चलाने की घोषणा की है। वैसे अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के सिर्फ उत्तरी क्षेत्रीय कार्यालय में 1500 कॉलेजों ने इस साल हिंदी और छह अन्य भारतीय भाषाओं में इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट और आर्किटेक्चर डिप्लोमा कोर्स शुरू करने के लिए आवेदन किया है। 

आखिर हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में तकनीकी शिक्षा की आवश्यकता 21वीं सदी के तीसरे दशक में क्यों महसूस की गई? वह भी तब जब इसी तकनीक से उपजी क्रांति ने पूरी दुनिया को ग्लोबल विलेज में समेट दिया है। जब तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में कैम्प्स एक्सचेंज प्रोग्राम का युग शुरू हुए भी दशक से ज्यादा बीत चुका है। इन पाठ्यक्रमों की वकालत में जो दलीलें दी जा रही हैं, उनमें सबसे ऊपर है अंग्रेजी में पिछड़े छात्रों के लिए तकनीकी शिक्षा का द्वार खोलना। एनआईटी पटना के निदेशक प्रो. प्रदीप कुमार जैन कहते हैं- हिंदी माध्यम के कुछ ऐसे विद्यार्थी होते हैं जिनकी अंग्रेज़ी भाषा में पकड़ अच्छी नहीं होती। ऐसे छात्र अगर इंजीनियरिंग, मेडिकल जैसे फील्ड में जाते हैं तो अंग्रेज़ी की वजह से उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। जिसे देखते हुए ही अब संस्थान हिंदी माध्यम में पढ़ाई की शुरुआत कर रहें हैं। राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. पीयूष त्रिवेदी ने कहा था हिंदीभाषी छात्रों को तकनीकी शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अंग्रेजी की अनिवार्यता से इस क्षेत्र में छात्रों का रुझान घट रहा है।

प्रो. त्रिवेदी की दलील कितनी सही है यह तो दावे से कहना मुश्किल है, लेकिन यह सच है कि इंजीनियरिंग में छात्रों का रुझान पिछले कुछ वर्षों में निरंतर घटता गया है। इस दौरान देशभर में इंजीनियरिंग कॉलेजों के बंद होने का सिलसिला शुरू और फिर तेज़ हुआ है। जो चल रहे हैं, उनमें भी सीटों की संख्या पिछले दस साल में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। एआईसीटीई से मान्यता प्राप्त संस्थानों में 2014-15 में लगभग 32 लाख इंजीनियरिंग सीटें थीं, जो घटकर इस साल 23.28 लाख (ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन के मुताबिक) रह गई हैं। इस साल ही संस्थान बंद होने और क्षमता में गिरावट के कारण 1.46 लाख सीटें कम हुई हैं। पिछले दो साल की गिरावट में कोरोना को सबसे बड़ी वजह माना जा सकता है, लेकिन सबसे बड़ा सच यह है कि इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद भी नियोजन की गारंटी न मिलने के कारण बड़ी संख्या में छात्रों ने मुंह मोड़ लिया और 2015 से अब तक औसतन 50 इंजीनियरिंग कॉलेज हर साल बंद हुए।

तो क्या हिंदी में कोर्स का विकल्प देने के पीछे सिर्फ इन संस्थानों को तालाबंदी से बचाने की मंशा है? यह प्रश्न इसलिए लाजिमी है क्योंकि पाठ्यक्रम का माध्यम बदलना और हिंदी भाषा में पाठ्यक्रम बनाना दो अलग प्रयोग है। राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में पांच साल पहले जब यह कोर्स शुरू करने की योजना बनी तो विश्वविद्यालय ने इस बाबत अनुवादकों के आवेदन मंगाए। लेकिन प्रयोजन का पता चलते ही अधिकतर अनुवादक पीछे हट गए। उनका कहना था कि भाषाई अनुवाद तो आसान है, लेकिन अंग्रेजी के पूरे शब्दकोश को हिन्दी में कन्वर्ट करना नामुमकिन। दरअसल हाल के दशकों में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में जितने भी नए शब्द जन्मे, उनमें से किसी का हिंदी विकल्प तक नहीं गढ़  पाए हैं हम। तो फिर हिंदी भाषा में इंजीनियरिंग की मौलिक पुस्तकों की अपेक्षा फिलहाल तो बेमानी ही लगती है। हां, कुछ अनू​दित पुस्तकें बाजार में जरूर आ गई हैं, लेकिन अनुवाद का स्तर ऐसा कि यकीन मानिए ये अनू​दित पुस्तकें छात्रों के लिए सुगमता से ज्यादा पेचीदगियां पैदा करेंगी। (पोस्ट के साथ लगाई गई तस्वीर को गौर से देखें। इंजीनियरिंग की एक अनू​दित पुस्तक का कवर पेज है। देखें और स्वतः अनुमान लगाएं)

कुल मिलाकर यह प्रयोग किसी भी लिहाज से उत्साहजनक तो नहीं दिख रहा है। फ़र्ज़ कीजिए, अगर ये कोर्स चल भी गए और बड़ी संख्या में छात्र पास भी होते गए तो इनके नियोजन की गारंटी क्या होगी? क्षेत्रीयता की सीमा उनके करियर की उड़ान को विस्तार देगी या बंधन? क्या वे वैश्विक स्तर पर हो रहे तकनीकी प्रयोगों से कदमताल में सक्षम होंगे? बेहतर तो यह होता कि इंजीनियरिंग का तमाशा बनाने की बजाय डिप्लोमा कोर्सेस का विस्तार ग्रामीण स्तर तक किया जाता। आईटीआई जैसे संस्थानों का जाल बिछाया जाता ताकि कौशल विकास के जरिये अधिक से अधिक युवा रोजगारोन्मुख बन सकें। हमारे देश का सर्विस सेक्टर दुनिया में सबसे बड़ा है और युवाओं की तादाद भी सबसे बड़ी। मेरा मानना है कि इन दोनों के बीच तकनीकी सामंजस्य देश में बेरोज़गारी की समस्या पर काफी हद तक अंकुश लगा सकता है। भारत जैसे विशाल मानवश्रम वाले देश में अधकचरे इंजीनियरों की बेरोजगार फौज बढ़ाने से बेहतर है तकनीकी कौशल में दक्ष युवाशक्ति का उन्नयन और इसके जरिये सामाजिक विकास को त्वरण का महामिशन।

साभार:फेसबुक वॉल | अनिल भास्कर
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