
डा. प्रदीप जैन की सद्यः प्रकाशित पुस्तक 'सोजे वतन : जब्ती की सच्चाई' बस इतनी सी बात रेखांकित करती है कि विश्व में भारतीय साहित्य के प्रतिनिधि बन चुके कथाकार-उपन्यासकार में एक सामान्य इंसान भी रहता था जिसके भीतर भी यश लिप्सा जनित अंतर्विरोध थे और जिनकी तथ्यपरक जानकारी देना न तो उनकी अवमानना है न ही साहित्यिक अपराध।
' प्रेमचंद के कहानी संकलन "सोजे-वतन" तथा "समर यात्रा" कभी जब्त नहीं किए गए। परन्तु आश्चर्यजनक रूप से अपनी उपर्युक्त संदर्भित आत्मकथा तथा "समर यात्रा" को जब्त कर लिए जाने का भ्रामक समाचार अपने ही साप्ताहिक पत्र "जागरण" में प्रकाशित कराने के पश्चात प्रेमचंद इन दोनों संकलनों का नामोल्लेख किए बिना स्पष्ट शब्दों में "एक-दो किताबें जब्त" किए जाने का उल्लेख करते हुए 26 दिसम्बर 1934 के पत्र द्वारा इन्द्रनाथ मदान को सूचित करते हैं-
"मेरी रचनाओं ने कई बार सत्ता का आक्रोश जगाया है। मेरी एक-दो किताबें जब्त हुई थीं।" (पृष्ठ 119)
'प्रेमचंद का पहला कहानी-संकलन "सोजे-वतन" सितम्बर 1908 में प्रकाशित हुआ, प्रेमचंद द्वारा छद्म नामों से अपनी रचनाएं प्रकाशित कराने में "सोजे-वतन" तथा उससे उद्भूत प्रतिबन्धों की कोई भूमिका किसी प्रकार की नहीं थी और "सोजे-वतन" कभी जब्त नहीं किया गया न वैधानिक रूप से जब्त किया जा सकता था। परन्तु इतना अवश्य है कि "सोजे-वतन" की कहानियों को लेकर सरकारी शिक्षा विभाग तथा क्रिमिनल इंटेलिजेंस कार्यालय प्रेमचंद पर राजद्रोह का मुकदमा चलाना चाहते थे।.....इस प्रकरण में अंतिम आदेश पारित होने के उपरांत भी क्रिमिनल इंटेलिजेंस विभाग पांव पीटता रहा।' (पृ 125)
"सोजे-वतन" की प्रतियों में आग लगाने का कार्य स्वयं प्रेमचंद ने किया था, और इस कार्य के लिए उनको जिलाधीश ने नहीं वरन इंस्पेक्टर आफ स्कूल्स ने ही विवश किया था। .....अतः कलक्टर हमीरपुर द्वारा "सोजे-वतन" की प्रतियों को नष्ट किए जाने का उल्लेख प्रामाणिक सिद्ध नहीं होता। ' (पृ 108)
प्रदीप जैन अपने इस फैसले के समर्थन में दस्तावेज प्रस्तुत करते हैं जो मूलरूप में पुस्तक में प्रकाशित है।
प्रदीप जैन की ये पंक्तियां पढ़ी जानी चाहिए - 'शोध के क्षेत्र में व्यक्तिगत "ख़याल" अर्थात कल्पना के आधार पर किसी तथ्य से सहमत होना या असहमत होना कोई अर्थ नहीं रखता। शोध प्रमाण का अपेक्षी होता है' और ज़ाहिर है कि लेखक ने पोख्ता प्रमाण जुटाने के बाद ही यह कहने की हिम्मत की है कि शुरुआत मे प्रेमचन्द यश और किताब की बिक्री के बढ़ने के लोभ में अधूरी और भ्रामक जानकारी देते रहे जिसे उनके घनघोर प्रशंसक समाज ने सच मान लिया और वही बात दुहराते रहे। पूरी पुस्तक पढ़ने के बाद ही आप प्रदीप जैन के इस श्रमसाध्य शोधकार्य को नकारने की हिम्मत शायद जुटा पाएं।
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