हिंदी के प्रसार में अनुवाद की भूमिका महत्वपूर्ण : अनिल जोशी

वेब रिपोर्टर : कोई भी ‘भाषा’ प्रौद्योगिकी के लिए कच्चे माल की तरह होती है और इसका उपयोग ज्ञान-प्रसार के अलावा औद्योगिक मुनाफे के लिए भी किया जा सकता है। माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों ने यही किया है। चूंकि प्रौद्योगिकी आज के दौर की जीवन रेखा है, इसलिए इसके दायरे में अधिकाधिक भारतीय भाषाओं का उपयोग किया जाए तो इस क्षेत्र से अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। प्रौद्योगिकी ने अनुवाद को सरल बनाया है। यह कहने में कोई संकोच नहीं कि हिंदी को राजभाषा, संपर्क भाषा, राष्ट्रभाषा और विश्व भाषा बनाने में अनुवाद का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। यह बातें केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष अनिल शर्मा ‘जोशी’ ने केंद्रीय हिंदी संस्थान तथा विश्व हिंदी सचिवालय के तत्वावधान में विश्व हिंदी परिवार की ओर से आयोजित वेब गोष्ठी के दौरान कहीं।  

प्रौद्योगिकी और हिंदी अनुवाद विषयक कार्यशाला में शामिल लोगों को संबोधित करते हुए अनिल शर्मा ने कहा कि आज भी इंटरनेट पर अधिकांश जानकारी अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। हमारे देश में हजारों-लाखों नागरिक हैं जो सफल व्यापारी, दुकानदार, किसान, कारीगर शिक्षक आदि हैं। यह सभी अपने अपने क्षेत्र में कुशल एवं विद्वान हैं, लेकिन अंग्रेजी भाषा के जानकार भी हों यह जरूरी नहीं है। अनुवाद के जरिए हम इन्हें अच्छी सामग्री उपलब्ध करा सकें तो हिंदी भाषा का प्रसार तो बढ़ेगा ही, हिंदी के जरिए कमाई और मुनाफा के भी अवसर उपलब्ध होंगे। जोशी ने वर्ष 2008 में गूगल के प्रतिनिधियों से हुई भेंट को याद करते हुए कहा कि व्यावसायिक नजरिए से देखें तो गूगल आज कहां से कहां पहुंच गया। हमें भी व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ अनुवाद के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहिए।

कार्यक्रम की अध्यमक्षता करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. पूरन चंद टंडन ने अनुवाद की महत्ता पर जोर देते हुए कहा कि अनुवाद भाषा सेतु का काम करता है। नियम आधारित अनुवाद से अब हम कृत्रिम बुद्धि के युग आ गए हैं। यह ठीक उसी तरह है जैसे पहले लोग पैदल रास्ता तय करते थे फिर बैलगाड़ी आई, तांगा टम-टम आया उसके बाद दुपहिया, तिपहिया, चौपहिया वाहन आए। फिर हम एक दिन जहाज से उड़ने लगे। अनुवाद की यात्रा भी प्रौद्योगिकी के जरिए रोज-रोज आगे बढ़ रही है। इस क्षेत्र में संभावना भी बहुत है। 

प्रो. राजेश कुमार ने कार्यशाला में प्रौद्योगिकी और अनुवाद के अंत:संबंधों का वर्णन करते हुए पॉवर प्वाइंट प्रस्तुति दी। इसमें उन्होंने अनुवाद के दोनों पक्षों क्रमश: सैद्धांतिक व व्यावहारिक पक्ष का उदाहरण सहित वर्णन किया। उन्होंने कहा कि अनुवाद पहले नियम आधारित था फिर खोज आधारित हुआ और अब कृत्रिम बुद्धि आधारित हो गया है। अनुवाद को और अधिक सुगम बनाने के लिए ढेर सारी व्यावसायिक कंपनियां भी लगातार काम रही हैं तथा नए-नए सॉफ्टवेयर के साथ टूल्स उपलब्ध करा रही हैं। उन्होंने बताया कि भारत सरकार भी इस मामले में लगातार प्रयास कर रही है। मंत्रा तथा कंठस्थ जैसे ऐप सुगम अनुवाद को ध्यान में रखकर विकसित किए गए हैं। प्रो. कुमार ने ऑन—स्क्रीन अनुवाद का एक डेमो प्रस्तुत किया। इसके जरिए उन्होंने सभी को समझाया कि मौजूद टूल्स के जरिए अच्छा और गति के साथ शुद्ध अनुवाद किया जा सकता है। 

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि केंद्रीय अनुवाद ब्यू‍रो में संयुक्त निदेशक विनोद संदलेश ने कहा कि विषयविद् और भाषाविद् रेल की दो पटरियों की तरह चलते रहे हैं। प्रौद्योगिकी आधारित अनुवाद ने इन दोनों में मेल कराने का काम किया है। आज अनुवाद के लिए गूगल का प्रयोग आम हो गया है। स्मृमति आधारित अनुवाद की सुविधा होने के कारण अनुवादक गूगल को प्राथमिकता दे रहा है। लेकिन हमें यह मानकर चलना चाहिए कि परिणाम हमें वही मिलेगा जो हमने फीड किया है। इसीलिए सटीकता और 100 प्रतिशत शुद्धता की गुंजाइश अभी भी बनी हुई है। उन्होंने बताया कि केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो द्वारा लगभग 26 लाख साहित्यिक शब्दों को संग्रहीत किया गया है। लेकिन अभी भी हम सटीकता से दूर हैं।  

इस क्रम में वरिष्ठ पत्रकार भाषाकर्मी राहुल देव ने कहा कि अनुवाद के बगैर संसार का काम न पहले चला है, न आगे चलेगा। यह सच है कि तकनीक ने दुनिया के हर क्षेत्रों की तरह अनुवाद के क्षेत्र में भी काम को आसान बनाया है लेकिन मनुष्य की मेधा के समक्ष अब भी बहुत काम किया जाना बाकी है। कृत्रिम बुद्धि के उपयोग का जोर-शोर हर तरफ सुनाई दे रहा है लेकिन अभी उसकी जमीनी हकीकत आनी बाकी है। राहुल देव ने अनुवाद कर्म के अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि अनुवाद के दौरान एक भाषा दूसरी भाषा से मिलने को आतुर रहती है। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में विपुल साहित्य का भंडार है। यह विश्व की अनेक भाषाओं में बिखरा पड़ा है। भारत में भी साहित्य के अक्षय भंडार है। अनुवाद के जरिए हम इसे पूरी दुनिया में पहुंचा सकते हैं। तकनीक ने काम आसान किया है तो हमें आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, यांत्रिक की तरह साहित्यिक कृतियों के अनुवाद की योजना पर काम करना चाहिए। 

प्रति सप्ताह आयोजित होने वाली वेब गोष्ठी की शुरुआत शिलांग केंद्र के कृष्ण कुमार पांडेय द्वारा स्वागत भाषण से हुई। जवाहर कर्नावट, संध्या सिंह, जयशंकर यादव के संयोजन में चले कार्यक्रम का संचालन सिंगापुर से जुड़ी आराधना झा श्रीवास्तव ने किया। गृह मंत्रालय में सहायक निदेशक मोहन बहुगुणा ने विषय प्रर्वतन किया। कार्यक्रम के दौरान चंद्र मोहन रावल, प्रो. जगन्नाथन, वरुण जी, जापान से जुड़े मिजोकामी जी ने भी टिप्पणी की। कार्यक्रम का समापन करते हुए सिंगापुर से जुड़ी संध्या सिंह ने सभी अतिथियों, सहभागियों का आभार व्यक्त किया।

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