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900 साल बाद कश्मीर से केरल पहुंची राजतरंगिणी!

देश में अनुवाद की दशा और दिशा कुछ मामलों में बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। बाजार के विस्तार के चलते व्यावसायिक अनुवाद भले ही फल—फूल रहा हो लेकिन सामाजिक—सांस्कृतिक महत्व की पुस्तकों के अनुवाद की गति बहुत धीमी है। इस सुस्ती का आलम यह है कि 12वीं सदी में संस्कृत भाषा में लिखी गई कल्हण की राजतरंगिणी अब 21वीं सदी में मलयालम के पाठकों तक पुस्तक के रूप में पहुंच सकी है। 

प्रोलिंगो एडिटर्स डेस्क : देश की विभिन्न भाषाओं में मौजूद साहित्य के दूसरी भाषाओं में उपलब्ध होने की गति बहुत धीमी है। इस महत्वपूर्ण काम में सांस्थानिक प्रयास नाकाफी साबित हुए हैं। ऐसा साहित्य व्यक्तिगत स्तर पर किए गए प्रयासों के फलस्वरूप ही किसी खास भाषा—समाज के पाठकों तक पहुंच पाता है। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं। केरल के विद्वान टी.के. रमन मेनन (स्वर्गीय) द्वारा राजतरंगिणी का मलयालम भाषा में किया पहला अनुवाद उनके निधन के करीब 40 वर्ष बाद पुस्तक के रूप में सामने आया है। उनके अनुवाद की महत्ता को समझते हुए मलयाली भाषा के कुछ साहित्य प्रेमियों की पहल पर यह संभव हो सका। 

द हिंदू वेबसाइट पर प्रकाशित सी.पी. रविंद्रनाथन द्वारा इस पुस्तक की समीक्षा में उल्लेख है कि राजतरंगिणी का किसी विदेशी भाषा में पहला अनुवाद 13वीं सदी के पहले दशक में हुआ था। हैदर मलिक ने इसका परसियन में अनुवाद किया था। एशियाटिक सोसाइटी के समय में 1835 में इसका अंग्रेजी अनुवाद आया, जबकि 1852 में फ्रेंच अनुवाद। बाद के वर्षों में राजतरंगिणी का चर्चित अंग्रेजी अनुवाद 1900 में आया जिसे सर आरेल स्टीन ने किया था। 1935 में इसका अंग्रेजी अनुवाद रंजित सीताराम पंडित ने किया, जिसकी भूमिका पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लिखी थी। पांडेय राम तेज के द्वारा किए गए इसके हिंदी अनुवाद को भी सराहा गया। 

अपनी पुस्तक समीक्षा में सी.पी. रविंद्रनाथन कश्मीर और केरल के सृजनात्मक संबंधों को रेखांकित करते हैं। वह कहते हैं कि संस्कृत भाषा की रचनात्मकता विरासत के रूप में कश्मीर के साथ ही केरल को भी मिली है। बहुभाषिक भारत की संकल्पना में संस्कृत ही वह डोर से जिससे विभिन्न भारतीय भाषाएं जुड़ी हैं। केरल की भूमि पर जन्म लेने और अद्वैत वेदांत को ठोस आधार देने वाले आदि शंकराचार्य ने चार मठों के माध्यम से भारतभू​मि की सांस्कृतिक एकता को एक सूत्र में पिरोया। उस संकल्प की भाषा संस्कृत ही थी। 

इस पृष्ठभूमि में मेनन द्वारा अनूदित यह पुस्तक संस्कृत से मलयालम में हुए अनुवादों की सूची में एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसकी बुनियाद कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुवाद ने रखी थी। सी.पी. रविंद्रनाथन लिखते हैं कि इस अनुवाद में मेनन राजतरंगिणी की आत्मा को कायम रखने में सफल हैं। ऐसा इसलिए संभव हो सका है क्योंकि मेनन संस्कृत और मलयालम दोनों के अच्छे जानकार थे। इस पुस्तक में रमन मेनन की विद्वता की छाप दिखती है। 

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