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झूठ-मक्कारी में पी.एच.डी. किए बैठा है वो, कौन टिक पाया भला उसके हुनर के सामने

सामाजिक सरोकारों से जुड़े 21 शायरों की ग़ज़लों का पठनीय संकलन

अजीत शर्मा ’आकाश’
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि काव्य सृजन की विधा में आजकल ग़ज़ल का दौर है। ग़ज़ल का जादू साहित्य प्रेमियों के सिर चढ़कर बोल रहा है। यही कारण है कि नित नये ग़ज़लकार और ग़ज़लों के संग्रह प्रकाश में आ रहे हैं। आज के रचनाकार भी ग़ज़ल व्याकरण एवं बह्र-विधान को सीख रहे हैं। गुफ़्तगू पब्लिकेशन के ‘ग़ज़ल संग्रह’ सीरीज के अंतर्गत ‘देश के 21 ग़ज़लकार’ पुस्तक का प्रकाशन किया गया है, जिसमें अच्छे, सधे हुए एवं नये ग़ज़लकारों की ग़ज़लें संकलित की गई हैं। पुस्तक में रचनाकारों ने अधिकतर सामाजिक सरोकार, स्त्री विमर्श, जीवन की विसंगतियां आदि सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दों को उठाया है। ग़ज़लकारों ने अच्छे कथ्य का चयन किया है एवं अधिकतर का शिल्प पक्ष भी सराहनीय है। ‘देश के 21 ग़ज़लकार’ भी एक ऐसा ही संकलन है, जो हमारे समय के विभिन्न रचनाकारों को पाठकों के सम्मुख लाता है। इस पुस्तक में सम्मिलित कुछ रचनाकारों के अश्आर उल्लेखनीय हैं, जिन्हें यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।

 वरिष्ठ शायरा देवी नागरानी ज़िन्दगी के बारे में कहती हैं-‘गिरते रहे, उठते रहे, खुद से सदा लड़ते रहे/इस ज़िन्दगी की जंग में हारे कभी जीते कभी।’ विजय लक्ष्मी विभा का शेर- ‘धूल ऐसी जम गई, चेहरे नजर आते नहीं/आइने भी अब हमारे, अक़्स दिखलाते नहीं।’ संकलन में सम्मिलित फ़रमूद इलाहाबादी हजल (हास्य एवं व्यंग्य की ग़ज़लें) के शायर हैं, जिनके अश्आर सीधे-सीधे अव्यवस्थाओं पर प्रहार करने के साथ ही एक सन्देश भी देते हैं-‘टकरा गई है ट्रेन, मरे होंगे सैकड़ों/अख़बार दे रहे हैं ख़बर तीन चार पांच।’, ‘झूठ-मक्कारी में पी.एच.डी. किए बैठा है वो/कौन टिक पाया भला उसके हुनर के सामने।’ ओम प्रकाश यती एक अच्छे एवं प्रतिष्ठित गजलकार हैं, जो ग़ज़ल विधा को और अधिक समृद्ध बना रहे हैं-‘ये सियासत है, यहां है मुस्तकिल कुछ भी नहीं/दल बदलते ही बदलते हैं वफ़ादारों के रंग।’ इकबाल आजर-‘बारहा तल्ख़ हक़ी़कत से चुरा कर आंखें/ज़िन्दगी जीते हैं हम आज भी ख़्वाबों की तरह।’ उस्मान उतरौली की ग़ज़लें भी सराहनीय हैं-‘बच्चों की भूख, हसरतें, नाकामियां थकन/सोना पड़ा है रोज यही ओढ़ कर मुझे।’ रईस अहमद सिद्दीक़ी का कहना है-‘चेहरे हैं कि सौ रंग में होते हैं नुमाया/आईने मगर कोई सियासत नहीं करते।’ डॉ. इम्तियाज़ समर-‘अजीब लगती हैं लोगों के ख़्वाहिशें मेरी/ज़मीं पे रह के सितारों की आरजू करना।’ डॉ. कमर आब्दी- ‘वहां पे चुप हैं, जहां बोलना ज़रूरी है/ज़बान वालों की कैसी ये बेजुबानी है।’ पुलिस अधिकारी डॉ. राकेश मिश्र ‘तूफान’ ने अपनी ग़ज़लों में वर्तमान व्यवस्था का बखूबी चित्रण किया है-‘जहां पे झूठ है, नफ़रत है, बेईमानी है/वहीं पे ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी बितानी है।’ विजय प्रताप सिंह- ‘हंसता है वो पागल तो हंस लेने दो उसे/मंज़िल के हर गाम पर वो रोया है बहुत।’ डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’-‘कोस कोस सरकार को कोस/महंगाई की मार को कोस।’ डॉ. सादिक देवबंदी-‘कैसे-कैसे हमने समझौते किए हैं दोस्तो/जुगनुओं की भीड़ को भी कहकशां कहना पड़ा।’ अनिल मानव की ग़ज़लें भी प्रभावशाली हैं-‘बाद गर्दिश के सितारे चमचमाएंगे जरूर/देखना तुम एक दिन हम जीत जाएंगे ज़रूर।’ इनके अतिरिक्त अर्श अमृतसरी, रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्धे, मणि बेन द्विवेदी, रामचंद्र राजा, डॉ. रामावतार मेघवाल, तामेश्वर शुक्ला ‘तारक‘ एवं ए. आर. साहिल की ग़ज़लें भी आशान्वित करती हैं।

कहा जा सकता है कि ‘देश के 21 ग़ज़लकार’ सामाजिक सरोकारों से जुड़ी प्रभावशाली ग़ज़लों का संकलन है। प्रकाशन का तकनीकी पक्ष श्रेष्ठ एवं मुद्रण उत्तम है, किन्तु कहीं-कहीं प्रूफ की अशुद्धियां भी हैं। इम्तियाज अहमद गाजी द्वारा संपादित एवं गुफ्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज द्वारा प्रकाशित 320 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 350 रुपये है।

पुस्तक: देश के 21 ग़ज़लकार (गजल संग्रह), 
संपादक: इम्तियाज अहमद गाजी,
प्रकाशक: गुफ्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज
पृष्ठ संख्या- 320, मूल्य: 350 रुपये

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पता - अजीत शर्मा ‘आकाश’
167, अतरसुइया, प्रयागराज, मोबाइल नंबर: 9838078756

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